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THE STORY BEHIND THE NEWSPAPER

The Story of The Indian Newspaper

हेलो दोस्तों, कैसे हैं आप लोग? मेरा नाम संदीप सिंह है। यह जो वेबसाइट है, 'द इंडियन न्यूज़पेपर', इसके पीछे कोई बहुत बड़ी कहानी या बिज़नेस लॉजिक नहीं है। दरअसल, मुझे पढ़ाई-लिखाई और नई चीज़ें जानने का बहुत शौक है। मेरा दिमाग एक 10 साल के बच्चे जैसा है जिसे हमेशा कुछ नया सीखने की भूख रहती है। मुझे बताने वाला कोई नहीं था कि जिंदगी में क्या करना है, लेकिन हमेशा कुछ नया सीखना और उसे बहुत जल्दी सीख जाना ही मेरी सबसे बड़ी क्वालिटी रही है। मैं हार नहीं मानता। क्या पता भगवान ने मेरे लिए कुछ अच्छा ही लिखा हो, क्योंकि जो भी आपके साथ जिंदगी में होता है उसके ज़िम्मेदार आप खुद होते हैं, किसी और को दोष नहीं देना चाहिए।

एक वक्त था जब मैं एक बहुत ही अनुशासित (Disciplined) इंसान था। मेरा डेली रूटीन कुछ ऐसा था कि मैं रोज़ सुबह 5 बजे उठकर साइकिल से 5 किलोमीटर दूर पार्क जाता था, वहां 10 किलोमीटर दौड़ लगाता था, और फिर वापस आता था। उसके बाद मैं साइकिल से ही खान मार्केट (Khan Market) काम करने जाता था। मुझे पैसे बचाने का बहुत शौक था—मेरी सैलरी सिर्फ 22,000 थी, जिसमें से 10,000 मैं घर पर देता था। अगर मैं 9 हज़ार किराये में दे देता, तो बचाता क्या? इसलिए साइकिल से ही जाता था, जिससे हेल्थ भी अच्छी रहती और सेविंग भी। जिस दिन मेरा वीक-ऑफ होता था, उस दिन मैं घर से कनॉट प्लेस (Connaught Place) तक करीब 21 किलोमीटर रनिंग करता था। मेरा अनुशासन इतना सख्त था कि घर वाले भी परेशान थे। मेरी जिंदगी में एक डिग्निटी थी—किसी की बहन-बेटी पर गंदी नज़र नहीं, कोई नशा नहीं, नो स्मोकिंग, नो ड्रिंकिंग। मुझे एकांत पसंद था और मेरा फोकस सिर्फ कुछ बड़ा करने पर था।

लेकिन अचानक वो दिन आया... 2022 का अंत था (नवंबर या दिसंबर), मैं साइकिल से अपने ऑफिस जा रहा था कि अचानक एक बैटरी रिक्शा वाले ने टर्न ले लिया और मेरी साइकिल क्रैश हो गई। मैं ब्रिज से नीचे जा रहा था, इसलिए स्पीड थोड़ी ज़्यादा थी और मेरी पूरी साइकिल ख़त्म हो गई। उस दिन तो मैं ट्रॉमा सेंटर गया, एक्स-रे हुआ, पर कुछ नहीं निकला। लेकिन 6-7 महीने बाद मेरी दाईं तरफ दर्द शुरू हुआ। इलाज चलता रहा और मैं दर्द के साथ धीरे-धीरे जॉब भी करता रहा।

"वह साइकिल आज भी मेरे पास है, और जब भी मैं उसे देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि वो मुझसे कह रही है— 'संदीप, मैं तुमसे माफ़ी मांगना चाहती हूँ उस दिन के लिए...'"

फिर जुलाई 2025 में एक दिन मुझे बहुत तेज़ बुखार आया (टाइफाइड)। अचानक से मेरे पैरों ने चलना बंद कर दिया और मुझे अपनी जॉब छोड़नी पड़ी। डॉक्टर्स ने कहा कि इमरजेंसी में सर्जरी करनी पड़ेगी—हड्डी में इन्फ्लेमेशन हो गया था (और भी कुछ मेडिकल कारण थे जो मैं यहाँ नहीं बता सकता)। वो इतनी बड़ी सर्जरी थी कि मैं 2025 से बिस्तर पर ही हूँ। एक साल हो गया है, अब मैं चलने तो लग गया हूँ, लेकिन एक दिन में 1 किलोमीटर से ज़्यादा पैदल नहीं चल सकता। डॉक्टर्स ने मुझे नीचे बैठने से और रनिंग करने से जिंदगी भर के लिए मना कर दिया है। एक तरह से मैं डिसेबल्ड (Disabled) की कैटेगरी में आ गया हूँ। लेकिन मुझे कोई दुख नहीं है। ईश्वर ने कुछ अच्छा ही सोचा होगा, कम से कम मेरे पास मेरी जिंदगी तो है। बस, मैं अपना वो पुराना अनुशासन बहुत मिस करता हूँ।

बिस्तर पर लेटे-लेटे मैंने सोचा कि ऐसे तो काम नहीं चलेगा, रोटी चलाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। तब मैंने अपनी 'फ़ास्ट लर्निंग' वाली क्वालिटी का इस्तेमाल किया। यूट्यूब से प्रोग्रामिंग सीखने की ठान ली। पहले Java ट्राई की, पर रत्ती भर भी समझ नहीं आई। फिर मैंने दिमाग लगाया कि सबसे ज़्यादा लोग कहाँ होते हैं? ब्राउज़र पर! तो वेबसाइट बनाना सीखा। मुझे लगता था कि HTML, CSS बनाकर इंस्टाग्राम की तरह अपलोड कर दो, बस हो गया काम। मुझे नहीं पता था कि JavaScript ही असली ब्रेन है। पिछले 1 साल में बिस्तर पर रहकर मैंने Vs Code, "CMD Command Prompt", Terminal, HTML, CSS, JavaScript, Next.js, Google Firebase, Google Search Console, Vercel और Adobe Photoshop सीखा और 1 महीने की कड़ी मेहनत से यह वेबसाइट बनाई है।

मैंने यह वेबसाइट पैसे कमाने के लिए नहीं बनाई है। मुझे पढ़ना, लिखना और नई जानकारी ढूँढना बहुत अच्छा लगता है, इसलिए बनाई है ताकि मैं आप तक हर तरह की न्यूज़ और जानकारी पहुँचा सकूँ। मेरी यही प्रार्थना रहेगी कि मेरे रीडर्स और इस वेबसाइट पर आने वाले लोगों के साथ वो कभी ना हो जो मेरे साथ हुआ है और वह हमेशा खुश रहे और भगवान हर किसी पर अपना आशीर्वाद बनाए रखे।

आपका अपना दोस्त

संदीप सिंह

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